Mahabharata Secrets: महाभारत के महाकाव्य में भीष्म पितामह का विशेष महत्व है। उनके जीवन की कई अद्भुत घटनाओं ने हमें धार्मिक और सामाजिक मूल्यों को समझाने में मदद की है।
उनका कुरुक्षेत्र युद्ध में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही, जहाँ उन्होंने अपने धर्म के प्रति वचन निभाया और अपनी विशेष क्षमताओं को प्रदर्शित किया।
एक कथा के अनुसार जब भीष्म पितामह युद्ध भूमि पर बाणशैया पर लेटे हुए थे, तब द्रौपदी ने उनसे एक सवाल किया जो हमें उनके व्यक्तित्व की गहराई को समझने में मदद करता है।
द्रौपदी ने किया सवाल
द्रौपदी ने उनसे पूछा कि उन्होंने क्यों दुर्योधन और दुशासन द्वारा की गई अन्याय को नहीं रोका, उनकी रक्षा क्यों नहीं की। और क्या उन्हें द्रौपदी के चीरहरण के समय मौन धारण करना चाहिए था?
भीष्म पितामह ने दिया समाधान
उस समय भीष्म पितामह ने द्रौपदी को उसका समाधान दिया, जिसने उनके व्यक्तित्व की गहराई को और भी निखारा। उन्होंने बताया कि वे दुर्योधन के अन्न का ग्रहण करके मौन धारण क्यों किया था, उसका प्रभाव उनके धर्म पर पड़ा था।
उन्होंने स्वयं को दुर्योधन के प्रति ऋणी माना और उसके अधीन हो गए। इससे उनका मौन धारणा उनके स्वार्थ से नहीं, धर्म की रक्षा के लिए था।
अन्न का ऋण
भीष्म पितामह ने द्रौपदी को बताया कि वे अपने ऋण से मुक्त होकर आज यह सत्य बता रहे हैं। उन्होंने कलियुग की घटनाओं को पूर्वानुमान किया था और उसी अनुभव के आधार पर धर्म की महत्वपूर्णता को समझाया। उन्होंने इस घटना को देखकर भविष्य में होने वाली बुराइयों की भी चेतावनी दी थी।
कलयुग का जिक्र
वर्तमान समय में भी यही देखने को मिल रहा है। आज के परिवेश में भले लोग अगर बुरे लोगों के यहां काम करके उनका दिया अन्न ग्रहण करते हैं, तो अन्न का कर्तव्य निभाना जिम्मेदारी बन जाती है।
जिसके कारण लोगों के गलत करने पर भी उसका अन्न खाने वाला व्यक्ति बुरे लोगों का विरोध नहीं कर पाता। इसी पर कहा गया है कि बुरे कर्म करने वाले लोगों का अन्न कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
भीष्म पितामह के इस सत्य ने हमें यह शिक्षा देता है कि धर्म के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हमें उसकी रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अन्याय के सामने हमें धर्म का पक्ष लेना चाहिए, चाहे वह अपनी स्थिति या उन्हीं के समर्थन में हो।
इस घटना से हमें यह भी सिखने को मिलता है कि अन्न का कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन किसी भी स्त्री के सम्मान से बड़ा नहीं होता। धर्म और सत्य के पक्ष में हमेशा खड़े रहना चाहिए, चाहे वह अन्न या किसी और रूप में हो।
भीष्म पितामह की यह बात हमें आज भी गहरे मनन पर आमंत्रित करती है कि हमें सदैव धर्म और सत्य के पक्ष में खड़े रहना चाहिए, चाहे जीवन किसी भी परिस्थिति में हो।
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