पीएम #मोदी को #प्रतिभा दिखा चुके #कलाकार आज #पहचान को #मोहताज… विलुप्ति की #कगार पर #पहुंची ये #लोक कला, खुद #संजोे रहे #अपनी #धरोहर
पंकज दाऊद @ बीजापुर। जिले के विभिन्न गांवों में विलुप्ति की दहलीज पर पहुंच चुकी लोक कला गेड़ी नृत्य को अब बोरजे गांव के कलाकार संजोने लगे हैं। यहां के कलाकार अपनी अगली पीढ़ी को भी ये कला सीखा रहे हैं। सरकारी प्रोत्साहन और आश्वासन से दूर ये कलाकार अभी भी अपनी कला दीगर प्रांतों में बिखेर रहे हैं।
यहां हरेली पर्व पर गोधन न्याय योजना के शुभांरभ के अवसर पर आए गेड़ी नर्तक दल ने बताया कि अभी जिले में ये लोक कला सिमटती जा रही है। इस कला को आज भी बोरजे गांव के कलाकार संजाए हुए हैं।
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इस नर्तक दल के मुखिया किस्टा अंगनपल्ली ने बताया कि कुछ गांवों में हालिया सालों तक गेड़ी नृत्य लोकप्रिय था और इसके बहुत कलाकार थे लेकिन धीरे-धीरे ये लुप्तप्राय होते जा रहा है। इसके पीछे आधुनिकीकरण भी एक सबब है।
इस कला को नई पीढ़ी सीखना नहीं चाहती है लेकिन वे बोरजे गांव में अपने बच्चों को इस लोक नृत्य से परे होना नहीं देना चाहते हैं। इस वजह से वे नई पीढ़ी को इसे सीखा रहे हैं। इससे ना केवल ये लोक नृत्य जीवित रहेगा बल्कि इससे गांव का नाम भी रौशन होता रहेगा।
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एक लोक नर्तक शंकर अंगनपल्ली ने बताया कि उनके गांव के सभी नर्तक दोरला जनजाति के हैं और इस जनजाति में ये लोकप्रिय है। वे अपनी संस्कृति जीवित रखना चाहते हैं। उनकी जनजाति के लोग दोरली और तेलुगू दोनों बोली-भाषा बोलते हैं।
गेड़ी नृत्य के लिए एक खास पोशाक की जरूरत होती है। इसमें घुंघरू के अलावा खास अंदाज के कपड़े शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इस लोक नृत्य को सरकारी तौर पर प्रोत्साहन नहीं मिलता है और ना ही कलाकारों को किसी तरह की सुविधा।
देश में जलवा बिखेरा
इस गांव के नर्तक रायपुर और जगदलपुर में प्रस्तुति देने अक्सर जाते हैं और कई बार इन्हें पुरस्कार भी मिला है। बीजापुर में हर राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें आमंत्रित किया जाता है। वे सुकमा, चित्रकोट, मलकानगिरी, मण्डला आदि स्थानों पर भी प्रस्तुति दे चुके हैं। पीएम के जांगला प्रवास के दौरान भी वे स्वागत में शामिल थे।
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