लोहारी का काम करते देख पटवारी ने दोरला को लोहार बना दिया… भ्रम ने छीन लिया 3000 लोगों का हक !
पंकज दाऊद @ बीजापुर। जिले में करीब साढ़े तीन दशक पहले उपजे एक भ्रम का शिकार दोरला जनजाति के करीब 3 हजार लोग हो गए हैं। उसूर एवं भोपालपटनम ब्लाॅक में फकत इसलिए राजस्व कर्मियों ने उनकी जाति लोहार अंकित कर दी क्योंकि कई दोरला परिवार लोहारी का काम भी करते थे। अब उन्हें ना तो आरक्षण का लाभ मिल पा रहा है और ना ही सरकार की ओर से जनजातियों को मिलने वाली सुविधाएं।
दोरला जनजाति के ही जिला पंचायत उपाध्यक्ष कमलेश कारम इस बात को लेकर बेहद फिक्रमंद हैं। वे बताते हैं कि उसूर एवं भोपालपटनम ब्लाॅक के कई गांवों में ये समस्या करीब साढ़े तीन दशक पहले उपजी।
इलमिड़ी, यंगपल्ली, लंकापल्ली, जिनिप्पा, संकनपल्ली, जारगोया, पेगड़ापल्ली, संगमपल्ली, मोटलागुड़ा, चेरकडोडी, भण्डारपाल, भट्टीगुड़ा, आईपेंटा, चेरामंगी एवं अन्य गांवों में बसने वाली इस जनजाति के कई परिवार एक त्रुटि की पीड़ा झेल रहे हैं।

जिला पंचायत उपाध्यक्ष कमलेश कारम बताते हैं कि अब ये लोग अन्य पिछड़ा वर्ग में शुमार हो गए हैं। अब ऐसे परिवारों के जाति प्रमाण पत्र में दोरला अंकित करवाने के लिए प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए सीएम भूपेश बघेल से भी मुलाकात की जाएगी।
Read More: पुलिस लाइन में जवान की बिगड़ी तबीयत, अस्पताल में निकला कोरोना… जगदलपुर जाते वक्त रास्ते में हुई मौत
सरकारी योजनाओं की सब्सिडी एवं दीगर लाभ इन परिवारों को नहीं मिल पा रहे है। उच्च षिक्षा के लिए बड़े संस्थानों में दाखिले के लिए भी जाति प्रमाणपत्र की दरकार होती है लेकिन इसके अभाव में युवा अच्छी षिक्षा से वंचित हो जाते हैं।
ढाई सौ परिवार तेलंगाना में
सलवा जुड़म शुरू होने के बाद से उसूर ब्लाॅक के दोरला जनजाति के कम से कम ढाई सौ परिवारों ने तेलंगाना की ओर रूख कर लिया। उसूर ब्लाॅक का कंचाल गांव तो पूरी तरह खाली हो गया। वहीं जारगोया से भी करीब पंद्रह परिवार तेलंगाना चले गए।
इस ब्लाॅक के पुसवाका, गगनपल्ली, चिन्नागेलूर, गुण्डम, पूवार्ती, कोण्डापल्ली, गुण्डरासगुड़ा, पालामड़गु, दारेली, कुमुड़तोम, बुटेतोम, मरकलगुड़ा, सेण्डरमबोर, रासपल्ली, एर्रापल्ली, रामपुर, धरमारम, जारपल्ली एवं कुछ अन्य गांवों से लोग चले गए।
वे तेलंगाना के कई हिस्सों में बस गए। मेडारम, भद्राचलम, मनगुर आदि इलाकों में दोरलों ने बस्ती बना ली। कुछ ने खेत भी तैयार कर लिए। अब तेलंगाना सरकार ऐसे परिवारों पर राजस्व का प्रकरण चला रही है।
कुछ लोग दूसरे के खेतों या प्रतिष्ठानों में मजदूरी कर रहे हैं, तो कुछ खेती कर रहे हैं। कई लोगों ने दूसरे के खेतों को सालभर के लिए ले लिया है और जब फसल कटती है तो इसमें से हिस्सा वे मालिक को दे देते हैं।
कोई संगठन नहीं
दोरला जनजाति का कोई अलग से संगठन नहीं है। वे गोण्डवाना समाज के साथ ही हैं क्योंकि दोरना जनजाति गोण्ड की ही एक शाखा है। जिला पंचायत उपाध्यक्ष कमलेश कारम बताते हैं कि उसूर और भोपालपटनम में ये जनजाति अधिक बसती है। वहीं बीजापुर ब्लाॅक में कुछ लोग बसते हैं।
Read More:
अभी नहीं होगी इस बोली की बोलती बंद ! दोरलों के इलाकों में हिन्दी नहीं हो पाई हावी https://t.co/gFpoAYKEGu
— Khabar Bastar (@khabarbastar) September 15, 2020
सुकमा जिले के कोण्टा ब्लाॅक में भी दोरला लोग रहते हैं। इस ब्लाॅक से भी तेलंगाना एवं सीमांध्र की ओर पलायन हुआ है। दोरले सरकारी सेवा में भी हैं और अधिकारी भी बने हैं। सियासत में भी इनकी पकड़ है। उसूर ब्लाॅक में ही जिला पंचायत सदस्य, जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष एवं अन्य प्रतिनिधि इसी जनजाति के हैं।
- आपको यह खबर पसंद आई तो इसे अन्य ग्रुप में Share करें…
हमारे इस वेबसाइट पर आपको ताजा News Update सबसे पहले मिलेगी। चाहे वो Latest News हो, Trending खबरें हो, या फिर Govt Jobs, रोजगार व सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी।
हमारी कोशिश है कि आपके काम की हर खबर आप तक सबसे पहले पहुंचे। अगर आप हमारी खबरों का नोटिफिकेशन तुरंत पाना चाहते हैं तो हमारे WhatsApp ग्रुप और टेलीग्राम चैनल से जुड़ सकते हैं।